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राम ने जहां बिताए वनवास के 12 साल, कृष्‍ण का वहां से क्‍या है नाता

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी महाराष्ट्र के नासिक पहुंचे. इस दौरान उन्‍होंने दौरे पर हैं. इस दौरान उन्‍होंने पंचवटी में महाअनुष्‍ठान किया. इस जगह का भगवान राम, माता सीता और लक्ष्‍मण से सीधा संबंध है. ये वही जगह है, जहां से रावण ने माता सीता का अपहरण किया था. फिर राम-लक्ष्‍मण ने रावण वध और लंका विजय का अपना अभियान शुरू किया था. ये उनके वनवास का अंतिम समय भी था. इससे पहले श्रीराम 14 साल के वनवास में 12 साल एक ही जगह रहे. श्रीराम ने 12 साल एक ही जगह रहकर संन्‍यासी जीवन बिताया. वनवास के बचे हुए 2 साल में ही उन्‍होंने मारीच वध, बालि वध, रामसेतु निर्माण से लेकर रावध वध जैसे बड़े-बड़े काम किए.

राम-सीता विवाह के कुछ दिन बाद महाराज दशरथ ने उन्हें राजा बनाने की घोषणा कर दी थ्‍ज्ञी. राज्याभिषेक से ठीक पहले कैकयी ने दशरथ से दो वर मांग लिए. इसके बाद राम को 14 साल के वनवास पर जाना पड़ा, जबकि भरत को राजा बनाया गया. राम सीता और लक्ष्मण ने 14 साल के वनवास में से करीब-करीब 12 साल चित्रकूट में ही बिताए थे. फिर तीनों चित्रकूट से पंचवटी पहुंचे थे. किताब ‘राम वन गमन पथ’ में बताया गया है कि वह वनवास के दौरान कौन-कौन सी जगह गए थे. साथ ही इसमें ये भी बताया गया है कि किस जगह पर तीनों कितने समय तक रहे.

राम ने किसके रथ पर की वनवास की शुरुआती यात्रा
अयोध्‍या से चित्रकूट की दूरी 250 किमी से ज्‍यादा है. राम, सीता और लक्ष्‍मण वनवास के दौरान सबसे पहले चित्रकूट गए थे. तीनों ने इसमें से 140 किमी की यात्रा सुमंत्र के रथ पर की थी, जबकि बाकी सफर पैदल तय किया थ. सफर में सबसे तीनों ने तमसा नदी पार की. फिर श्रृंगवेरपुर से गंगा नदी पार करते हुए प्रयागराज पहुंचे. फिर यमुना नदी पार कर वाल्मीकि आश्रम पहुंचे. इसके बाद चित्रकूट पहुंचे. इसके बाद तीनों ने 11 साल 11 महीने और 11 दिन चित्रकूट में ही बिताए. चित्रकूट को राम की तपोभूमि भी कहा जाता है. चित्रकूट से तीनों माता अनुसूइया के आश्रम पहुंचे. फिर टिकरिया, सरभंगा आश्रम, सुतीक्ष्ण आश्रम, अमरपाटन, गोरसरी घाट, मार्कंडेय आश्रम, सारंगपुर होते हुए अमरकंटक पहुंचे. चित्रकूट से अमरकंटक की दूरी 380 किमी थी.

समुद्र पर रामसेतु का निर्माण महज पांच दिन के भीतर पूरा कर लिया गया था.

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अमरकंटक से पहुंचे पंचवटी, यहीं जटायु से मुलाकात
राम, सीता और लक्ष्‍मण अमरकंटक के बाद पंचवटी चले गए. यहीं गोदावरी के तट पर कुटिया बना ली. इसी कुटिया में राम की उनके पिता दशरथ के मित्र जटायु से मुलाकात हुई. पंचवटी में जब सूर्पणखा दोनों भइयों के विवाह प्रस्‍ताव ठुकराने पर सीता को मारने के लिए बढ़ी तो लक्ष्मण ने उसकी नाक काट दी. इसके बाद राम-लक्ष्‍मण ने खर-दूषण का वध भी पंचवटी में ही किया था. फिर सूर्पणखा रावण के पास पहुंची. रावण ने मामा मारीच की मदद से माता सीता का अपहरण कर लिया. फिर पंचवटी से 1255 किमी की यात्रा करके राम और लक्ष्‍मण दक्षिण में किष्किंधा पहुंचे, जो रामेश्‍वरम से 25 किमी दूर है. किष्किंधा नगरी अय्यपा स्‍वामी मंदिर से करीब पांच किमी दूर मौजूद पंपा नदी के पास ही है.

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महज 5 दिन में बना लिया था लंका तक रामसेतु
राम ने बालि का वध करके सुग्रीव को किष्किंधा का राजा बनाया. फिर सुग्रीव ने दक्षिण दिशा में हनुमान, अंगद, जामवंत, नल-नील को भेजा. रामभक्‍त हनुमान की भेंट संपाति नाम के गीध से हुई, जिसने उन्‍हें बताया कि सीता समुद्र में 100 योजन दूर लंका में है. लंका तक का ये पुल महज 5 दिन में बना लिया गया था. पहले दिन 14 योजन, दूसरे दिन 20 योजन, तीसरे दिन 21 योजन, चौथे दिन 22 योजन और पांचवें दिन 23 योजन का काम पूरा किया गया. हनुमान जी लंका जाकर माता सीता की जानकारी लाए और फिर राम नल-नील की मदद से समुद्र पर पुल बांधने के बाद लंका पहुंचे. उन्‍होंने लंका में रावण का वध किया और माता सीता को लेकर अयोध्या लौट आए.

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चित्रकूट के कामदगिरी पर्वत पर भगवान कृष्‍ण का बांके बिहारी मंदिर है.

चित्रकूट का श्रीकृष्‍ण से क्‍या है संबंध
राम ने वनवास के करीब 12 साल चित्रकूट के कामद गिरि में बिताए थे. कामदगिरी की परिक्रमा करके राम एक जगह पर शालिग्राम की पूजा करते थे. त्रेतायुग के पूरा होने के बाद द्वापरयुग में चित्रकूट के इसी कामदगिरि पर्वत में कृष्ण ने वास किया, जो बांके बिहारी कहलाए. लाखों की संख्या में श्रद्धालु यहां बांके बिहारी मंदिर आते हैं. त्रेतायुग पूरा हुआ तो श्रीराम की यादें चित्रकूट में बस गईं. युग बदला और द्वापर युग आया. इस युग में भगवान कृष्ण का अवतार हुआ. कहते इसीलिए त्रेता युग में राम चित्रकूट के जिस पर्वत पर रहे, उसमें श्री कृष्ण का वास माना गया है. उसी कामद गिरी पर्वत में बांके बिहारी नाम से आज भी श्री कृष्ण मंदिर है.

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